Galgotias University पर बढ़ता विवाद: रोबोटिक डॉग से लेकर ‘सॉकर ड्रोन’ तक सवालों के घेरे में दावे

Galgotias University पर बढ़ता विवाद: रोबोटिक डॉग से लेकर ‘सॉकर ड्रोन’ तक सवालों के घेरे में दावे

नई दिल्ली: हाल ही में Galgotias University एक बार फिर सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बन गई है। पहले रोबोटिक डॉग को लेकर विवाद और अब “इन-हाउस विकसित” बताए गए सॉकर ड्रोन पर उठते सवाल—दोनों मामलों ने विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता पर बहस छेड़ दी है।

 

Galgotias university

🤖 रोबोटिक डॉग विवाद क्या था?

मामला उस समय शुरू हुआ जब नई दिल्ली में आयोजित India AI Impact Summit के एक्सपो एरिया में विश्वविद्यालय ने एक चार-पैरों वाले रोबोट को “सेंटर ऑफ एक्सीलेंस” द्वारा विकसित उत्पाद के रूप में प्रदर्शित किया।

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में इसे “ओरियन” नाम से पेश किया गया। हालांकि, इंटरनेट उपयोगकर्ताओं ने जल्द ही पहचान लिया कि यह रोबोट दरअसल चीनी कंपनी Unitree Robotics का मॉडल Unitree Go2 है, जो भारतीय बाजार में 2–3 लाख रुपये के बीच उपलब्ध है।

विवाद बढ़ने के बाद विश्वविद्यालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर स्पष्टीकरण जारी किया। उसने कहा कि रोबोट छात्रों के प्रशिक्षण और रिसर्च उद्देश्यों के लिए खरीदा गया था और उसे स्वयं विकसित करने का दावा नहीं किया गया था।

 

⚽ सॉकर ड्रोन पर नया सवाल

रोबोटिक डॉग विवाद शांत भी नहीं हुआ था कि उसी दिन एक और दावा सवालों में आ गया। विश्वविद्यालय के एक कर्मचारी का वीडियो सामने आया, जिसमें कहा गया कि कैंपस में “एंड-टू-एंड इंजीनियरिंग” से एक सॉकर ड्रोन विकसित किया गया है और यह भारत का पहला ऑन-कैंपस सॉकर एरीना है।

लेकिन सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने दावा किया कि यह ड्रोन दक्षिण कोरियाई कंपनी Helsel Group द्वारा विकसित मॉडल Striker V3 ARF है, जिसकी भारतीय बाजार में कीमत लगभग 40,000 रुपये बताई जा रही है।

 

🌐 सोशल मीडिया की भूमिका

इन दोनों मामलों में सोशल मीडिया ने अहम भूमिका निभाई। कुछ ही घंटों में यूज़र्स ने प्रोडक्ट की पहचान कर ली और तुलना के साथ स्क्रीनशॉट साझा किए। इससे यह सवाल उठने लगा कि क्या संस्थान ने विदेशी तकनीक को स्वदेशी विकास के रूप में पेश किया?

 

🎓 संस्थानों की जवाबदेही क्यों ज़रूरी?

भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में तेजी से विकास हो रहा है। ऐसे में शैक्षणिक संस्थानों की पारदर्शिता और विश्वसनीयता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

यदि किसी तकनीक को खरीदा गया है और उसे सीखने या शोध के लिए उपयोग किया जा रहा है, तो इसमें कोई समस्या नहीं है। लेकिन यदि प्रस्तुति के दौरान भ्रम की स्थिति पैदा होती है, तो इससे संस्थान की साख प्रभावित हो सकती है।

 

📌 निष्कर्ष

Galgotias University से जुड़े ये दोनों विवाद केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं हैं। ये हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि तकनीकी उपलब्धियों के दावों में पारदर्शिता कितनी आवश्यक है।

आज के डिजिटल युग में जानकारी छिपाना मुश्किल है। ऐसे में संस्थानों के लिए बेहतर यही है कि वे स्पष्ट और तथ्यात्मक संवाद बनाए रखें—ताकि नवाचार की असली उपलब्धियां ही सामने आएं, न कि विवाद।

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